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छत्तीसगढ़ : एक ऐसा गढ़, जहाँ लोकगीतों, लोककथाओं और लोक नाचाओ की भरमार है।

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छत्तीसगढ़ में राउत नाचा एक ऐसा लोक नाचा है , जो लोक नाचा और लोकगीत का समिश्रण है जो आज भी गांवों में जीवंत है। राउत नाचा समाज के एक विशेष वर्ग जिसे राउत, रावत ,यादव ,  ठेठवार, यदु आदि नामो से जाना जाता है के द्वारा किया जाता है , ये वो वर्ग विशेष  है जो किसानों के मवेशियों के चराई और उनके देखभाल संबधित कार्यो से जुड़े होते है। इनको ग्वाला या चरवाहा भी कहते है।
 राउत नाचा में भी राउत एक अलग पोशाक पहनते है , इसमें धोती चितकबरे रंग का कुर्ता और सर पर साफा बांधा जाता है , नाचने वाले राउत अपने पीठ पर मयूर पंख से बने एक विशेष प्रकार के सजावट को सोहाई से बांधते है साथ ही पैरो में बड़े बड़े घुंघरू बांधा जाता है इन सब के अलावा राउत नाचा में लाठी का विशेष महत्व होता है जिसे मयूर पंख या अन्य कई तरीके से सजाया जाता है। इन सब साजो सज्जा और गाजे बाजे के साथ जब ग्वालो का समूह दोहा लगाते हुये गली में चलते है तो ये संस्कृति छत्तीसगढ़ में देखते ही बनती है। राउत जब अपने किशान या मालिक के घर एक साल तक काम कर जब वे आराम करने के लिए छुट्टी लेते है तब वह अपने दोस्तों और बाजो के के साथ अपने मालिक का धन्यवाद या अभिनन्दन करने जाते है


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