श्री उवासग्गहरम पार्श्व तीर्थ, नागपुरा

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श्री उवासग्गहरम पार्श्व तीर्थ, नागपुरा

श्री उवासग्गहरम पार्श्व तीर्थ, नागपुरा, यह पवित्र स्थान भारत की समृद्ध सांस्कृतिक अतीत को अपनी समृद्ध वास्तुकला के साथ प्रस्तुत करता है, यह अतुलनीय, विश्वास, अविनाशी भक्ति और निस्वार्थ समर्पण की कहानी बताता है।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र प्राचीन समय में जैन मतावलम्बियों का प्रमुख क्षेत्र था। कालान्तर में शासन कर रहे कलचुरी वंशज शिव तथा जिन उपासक थे। शिवनाथ नदी के पश्चिम तट पर नगपुरा, धमधा आदि ऐसे स्थान है जो सृजन और उत्थान के साक्षी हैं। दुर्ग से 17-18 किलोमीटर पर नगपुरा में तालाब के किरारे एक खंडहर मंदिर है जो एतिहासिक और पुरातत्वीय अनुठी सुन्दरता और उत्कृष्टता का उदाहरण है। यहाँ मिले साक्ष्य श्री पार्श्वनाथ प्रभु के विहार की पुष्टि करते हैं।
कहा जाता है कि कलचुरी वंशज गजसिंह ने श्री अधिष्टायिका देवी द्वारा श्री पाश्र्वनाथ के गणधर श्री केशीस्वामी द्वारा तीर्थंकर महावीर स्वामी की उम्र के 37वें वर्ष में तिंबुक उद्यान में परदेशी राजा निर्मित श्री पार्श्व प्रभु की प्राण प्रतिष्ठा कराई थी यही प्रतिमा श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ में तीर्थपति हैं। इस बात का उल्लेख भी मिलता है कि चैद पूर्वधर पूज्यपाद भद्रबाहू स्वामी ने इसी प्रतिमा का आलंबन लेकर उवसग्गहरं स्त्रोत को साध्य किया था। तब से प्रतिमा उसवग्गहरं पार्श्व नामांकित हुई।



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